People’s Union for Democratic Rights

A civil liberties and democratic rights organisation based in Delhi, India

17 फरवरी 2026 को शाम करीब 5:30 बजे, नंद नगरी के ब्लॉक B में सर्वोदय बाल विद्यालय के पास, उसी ब्लॉक के रहने वाले सुनील सरदार ने 41 साल के उमरदीन की गोली मारकर हत्या कर दी। उमरदीन पेशे से ड्राइवर थे और नंद नगरी के ही पास के ब्लॉक C में एक छोटे से किराए के घर में अपनी पत्नी और पांच बच्चों के साथ रहते थे। मोहल्ले के बच्चों के बीच झगड़ा हुआ था लेकिन सुनील सरदार और उनके दो भाईयों ने उमरदीन के बेटे की रास्ते में पकड़कर पिटाई कर दी और अपने इस हस्तक्षेप से सुनील ने झगड़े को बढ़ा दिया। जब उमरदीन अपने बेटे की मदद के लिए पहुँचे, तो सुनील ने अपने घर से रिवॉल्वर लाकर उन को गोली मार दी।

पीयूडीआर की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट, नंद नगरी में उमरदीन की हत्या (मार्च 2026) में सुनील सरदार ने उमरदीन को किन हालात में गोली मारी, इसकी जाँच पर आधारित है। रिपोर्ट में इस बात पर भी गौर किया गया है कि  पुलिस ने सुनील के खिलाफ तो मामला दर्ज किया, लेकिन चश्मदीद गवाह उमरदीन की पत्नी राबिया के बयान के बावजूद उसके दो भाइयों को इसमें शामिल करने से इनकार कर दिया, जबकि आरोप कई लोगों द्वारा मिलकर हत्या करने का था। इसके अलावा, मृतक और आरोपी दोनों के परिवारों से मिले बयानों के आधार पर, पीयूडीआर ने मोहल्ले के उन झगड़ों के पीछे के सामाजिक-आर्थिक ढांचे का विश्लेषण किया है जिनसे हिंसा होती है। साथ ही, यह भी बताया है कि कैसे पुलिस मृतक के परिवार के साथ खड़ी नहीं रही और FIR दर्ज करने में सिर्फ़ खानापूर्ति की। रिपोर्ट यह साफ करती है कि भले ही मोहल्ले के ऐसे झगड़े असल में सांप्रदायिक न हों, लेकिन पुलिस की निष्क्रियता और उदासीनता मृतक के परिवार—जो एक गरीब मुस्लिम परिवार है—के प्रति सांप्रदायिक भेदभाव को दिखाती है।

5 मार्च 2026 को उत्तम नगर में तरुण भुटोलिया की मौत के बाद की घटनाओं पर पीयूडीआर की जांच यह दिखाती है कि जब मुसलमानों पर एक हिन्दू की हत्या का आरोप लगता है तो क्या होता है। उत्तम नगर में संवैधानिक मशीनरी के सांप्रदायिकरण की मिसाल (जून 2026) रिपोर्ट बताती है कि कैसे 4 मार्च 2026 को होली के दौरान एक मामूली झड़प हिंसा में बदल गई, जिसमें चोट के कारण 26 वर्षीय तरुण की 5मार्च को अस्पताल में मौत हो गई। रिपोर्ट में बताया गया है कि मोहल्ले में हुई हिंसा की इस घटना को कैसे दबावमूलक स्थितियां बनाकर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर हिंदुत्व संगठनों के सांप्रदायिक एजेंडे से जोड़ दिया गया। ऐसा देखा जाता है कि साम्प्रदायिकता के लिए जातिवाद को हथियार बनाने की एक रणनीति होती है। इसी रणनीति के तहत उत्तम नगर में युवक तरुण की मौत को जातीय भावना से जोडने की इस रुप में कोशिश कि एक जातीय संगठन ने खास जाति समुदाय के बीच हत्या के विरोध लिए देश व्यापी आह्वान किया और आरोपित व्यक्तियों को कड़ी सजा देने की मांग की गई। इस मांग में हिंदुत्व संगठनों ने भी खुद को शामिल कर अपनी सांगठनिक सक्रियता बढ़ा दी। वहीं स्थानीय स्तर पर बीजेपी पार्षद साहिब असिवाल की देखरेख में आरोपित लोगों के खिलाफ अतिक्रमण और प्रदुषण फैलाने जैसे आरोपों पर सरकारी मशीनरी को कार्रवाइयों के लिए दबाव बनाया। यहां तक कि पार्षद ने आरोपित व्यक्ति के घर को बुल्डोजर से गिराने की कार्रवाई को दौरान अपनी उपस्थिति भी सुनिश्चित की। नतीजतन विभिन्न स्तरों पर सरकारी मशीनरियों की एकतरफा कार्रवाईयों ने इलाके में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने में मदद की।
यह दिखता है कि साम्प्रदायिक एजेंडा एक साथ कितने स्तरों पर सक्रिय रहता है, उत्तम नगर की घटना इसकी एक मिसाल है।

पीयूडीआर की जांच में पिछले तीन महीनों में सांप्रदायिक रंग लिए इन सरकारी कार्रवाइयों के नतीजें सामने हैं।

  • पुलिस का शुरुआती बयान कि मौत पड़ोसियों के बीच झगड़े के कारण हुई थी, जल्द ही बदल गया। मृतक के परिवार की ओर से सिर्फ़ एक FIR दर्ज की गई है। घटना के तथ्यों और अपनी गैर-कानूनी हिरासत के बारे में बाबू खान द्वारा द्वारका DCP को दी गई शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
  • FIR में 22 लोगों के नाम हैं और अभी 19 लोग जेल में हैं, जिनमें एक नाबालिग और तीन महिलाएं शामिल हैं। पता चला है कि हत्या के अलावा, SC और ST एक्ट की धाराएं भी लगाई गई हैं।
  • घटना के एक हफ्ते के भीतर, दिल्ली के मुख्यमंत्री कार्यालय ने मृतक के परिवार को बुलाया और मुख्यमंत्री ने व्यक्तिगत रूप से परिवार को न्यायका भरोसा दिलाया।
  • MCD ने अतिक्रमण के आधार पर दो आरोपियों के घर गिरा दिए और NGT ने प्रदूषण के आधार पर आरोपियों के कुछ घरों को नोटिस जारी किया। ये कार्रवाइयां तब हुईं जब आरोपियों के परिवार अपने घर छोड़कर भाग गए थे।
  • आरोपियों के परिवारों की महिलाएं और बच्चे 45 दिनों से ज़्यादा समय तक बेघर रहे। सांप्रदायिक भीड़ की भड़काऊ हरकतों के जरिये उनकी वापसी का विरोध किया गया। शिकायतों के बावजूद, पुलिस ने उन्हें सुरक्षा देने से इनकार कर दिया।
  • हाई कोर्ट ने मृतक के परिवार की सुरक्षा के आदेश दिए हैं। इस तरह, मृतक के परिवार की सुरक्षा के लिए तो गश्त बढ़ाई गई है, लेकिन मुस्लिम महिलाओं और बच्चों को परेशान होने से बचाने के लिए नहीं।

घटना के बाद की स्थिति दिखाती है कि कैसे संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग से समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज करने के मकसद से ‘बहुसंख्यक सहमति’ की प्रक्रिया बनाई जाती है। परेशान करने की रणनीतियां — जैसे बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां, ज़मानत न मिलना, संपत्तियों पर बुलडोज़र चलाना, घरों को सील करना और सांप्रदायिक भीड़ से सुरक्षा देने से इनकार करना — इन सबका मकसद डर का माहौल बनाना और मुसलमानों को मोहल्ले से बेदखल करना है। रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि सरकारी संस्थाओं के गलत इस्तेमाल से पैदा हुआ ऐसा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों के लोकतांत्रिक सिद्धांत को कमज़ोर करता है।

दीपिका टंडन और शाहाना भट्टाचार्य
(सचिव PUDR)
pudr@pudr.org

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