समाज में आमतौर पर होने वाले आपसी विवादों/ झड़पों या मतभेदों को साम्प्रदायिक राजनीति के लिए चारागाह बनाने की दो मिसालें है- नंद नगरी और उत्तम नगर हस्तसाल जे जे कालोनी की घटना। साम्प्रदायिकता का मुख्य औजार लोगों को एक दूसरे के साथ घुलने मिलने की सामाजिक प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिशों में देखा जाता है।साम्प्रदायिकता का दूसरा चरण धर्म के आधार पर समाज के सदस्यों को एक दूसरे को आमने सामने खड़ा करना माना जाता है और उन्हें सैन्य प्रवृतियों से लैश करने की कोशिश होती है। जहरीले नारे, भाषणों से पहले एक दूसरे के खिलाफ हमलावर होने की भावना तेज की जाती है और फिर आमतौर पर होने वाले समाज के बीच विवादों से धर्म के आधार पर निपटने की एक पृष्ठभूमि तैयार की जाती है।
यह दिखता है कि समाज में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज करने के लिए संविधान की संस्थाओं और सत्ता की मशीनरी के बेजां इस्तेमाल के लिए ‘बहुसंख्यक सहमति’ तैयार करने के हालात बनाए जा रहे हैं। जबकि संविधान और उसकी संस्थाओं की जिम्मेदारी बिना किसी भेदभाव के समाज के सभी सदस्यों को न्याय के प्रति भरोसा बनाए ऱखना है। नागरिकों के बीच संविधान पर भरोसे को कायम रखने के बजाय साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की तरफ धकेला जाना लोकतंत्र और नागरिकों के एक सामान अधिकार को कमजोर करने की एक चेतवानी के रुप में सामने आती है।धर्म की पहचान को उत्पीड़न को उचित मानने की संस्कृति को बढ़ावा देने में संवैधानिक मशीनरी का दुरुपयोग की मिसालें नागरिक अधिकारों, न्याय के प्रति भरोसा और लोकतंत्र के प्रति चिंता खड़ी करता है।
नंद नगरी और उत्तम नगर की घटनाओं को एक साथ ऱखने पर यह स्थिति साफतौर पर दिखती है।
धर्म के आधार पर नागरिकों को संवैधानिक इंसाफ से वंचित करना साम्प्रदायिकरण का औजार है और इस औजार को और जहरीला बनाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग तो बेमिसाल है।
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नन्द नगरी में उमरदीन की हत्या
