ओड़िशा के कालाहांडी ज़िले के कांतामल गाँव में स्थानीय पुलिस और गुंडों द्वारा की गई छापेमारी, हमलों और ग्रामीणों के घरों को तहस-नहस किए जाने की पी.यू.डी.आर कड़ी निंदा करता है। स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार 7 अप्रैल को लगभग रात में 2 बजे, पुलिस कुछ निजी लोगों के साथ गाँव में घुस गई। लोगों के बाहर निकलने पर उन पर आँसू-गैस के गोले छोड़े गए। कई ग्रामीणों को लाठियों से मारा पीटा गया। इस कार्रवाही के चलते दो महिलाओं के सिर में गंभीर चोटें आईं। दमन की यह कार्रवाही अगली सुबह के शुरुआती घंटों तक जारी रही। पुलिस के अनुसार जब वे ‘कानून तोड़ने वालों’ को गिरफ्तार करने गए, तो ग्रामीणों ने उन पर हमला किया।
सिजीमाली बॉक्साइट खनन परियोजना के खिलाफ चल रहे आंदोलन के मुख्य केंद्रों में से एक कांतामल है। यह परियोजना कालाहांडी और रायगड़ा ज़िलों के थुआमुल रामपुर और काशीपुर ब्लॉकों तक फैली हुई है। मार्च 2023 में ओड़िशा सरकार ने मेसर्स वेदांता लिमिटेड को 1,549 हेक्टेयर क्षेत्र में बॉक्साइट दोहन हेतु 50 साल की खनन लीज़ जारी की थी, जिसमें 699 हेक्टेयर वन भूमि भी शामिल थी। तभी से ग्रामीण ‘माँ माटी माली सुरक्षा मंच’ के नेतृत्व में इसका विरोध कर रहे हैं। यह मंच सिजीमाली की पहाड़ियों और जंगलों की रक्षा के अभियान का नेतृत्व करता है, और रायगड़ा तथा कालाहांडी में पाँचवीं अनुसूची के तहत आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्षरत है। विरोध कर रहे लोगों ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में याचिका दायर की जहाँ यह मामला अभी विचाराधीन है।
7 अप्रैल के दिन अंजाम दी गई छापेमारी और हमले की घटना 3 अप्रैल को जारी निषेधाज्ञा के आदेशों के बाद हुई। उस दिन, बड़ी संख्या में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने कांतामल गाँव को घेर लिया था। लाउडस्पीकर से सिजीमाली बॉक्साइट खदानों तक सड़क बनाने के फ़ैसले की घोषणा की गई। रायगड़ा के सब-कलेक्टर के निर्देशों के तहत, इस आदेश में निर्माणाधीन मार्ग के 100 मीटर के दायरे में चार से ज़्यादा लोगों के एकत्रित होने पर रोक लगा दी गई। ग्रामीणों को चेतावनी दी गई कि अगर उन्होंने इस आदेश का उल्लंघन किया, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 163 के अंतर्गत उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाएगी। हालाँकि, निषेधाज्ञा आदेशों की अवहेलना करते हुए प्रदर्शनकारी 4 से 6 अप्रैल तक पहाड़ियों पर डटे रहे और उन्होंने प्रशासन व पुलिस को निर्माणाधीन एप्रोच मार्ग तक नहीं जाने दिया। 7 अप्रैल की छापेमारी, ग्रामीणों पर पुलिस की हिंसा और घरों पर हमले इस बात का सबूत हैं कि प्रशासन और पुलिस ने स्थानीय निजी व्यक्तियों की मदद से, खनन परियोजना का विरोध करने वालों के ख़िलाफ़ जो आतंक का अभियान छेड़ रखा है, वह अब और तेज़ हो गया है। लोगों को पहले से ही यह आशंका थी कि निषेधाज्ञा आदेशों का इस्तेमाल उन्हें निशाना बनाने के लिए किया जाएगा। 7 अप्रैल की सुबह उनकी यह आशंका सच साबित हुई।
इस बात को ध्यान में रखना ज़रूरी है कि 7 अप्रैल की घटनाओं से पहले भी, मार्च 2026 में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ की गई थीं।
कालाहांडी ज़िले के थुआमल रामपुर ब्लॉक में स्थित एक 120 घरों वाला छोटा सा गाँव तलामपदर है। यह गाँव इस आंदोलन में एक अहम भूमिका निभा रहा है। 11 मार्च को, तलामपदर गाँव के 21 आदिवासियों को वेदांता कंपनी के एक समर्थक द्वारा की गई शिकायत के आधार पर गिरफ्तार कर लिया गया। शिकायत में कहा गया था कि आरोपियों ने गाँव के 40-50 अन्य निवासियों के साथ मिलकर, शिकायतकर्ता के घर में ज़बरन घुसकर उस पर और उसके भाई समेत छ: अन्य लोगों पर हमला किया। शिकायत के अनुसार इस हमले में कथित तौर पर उसका भाई गंभीर रूप से घायल हो गया था। कालाहांडी ज़िले के कारलापट थाने में दर्ज FIR में BNS के तहत कई धाराएँ लगाई गईं हैं—जिनमें हत्या का प्रयास (109 (1)), जानबूझकर गंभीर चोट पहुँचाना (117 (2)), दंगा करना (191 (3)), और साझा मक़सद के साथ अपराध करने के लिए गैर-कानूनी रूप से एकत्रित होना (190) शामिल है। गिरफ्तार किए गए लोगों में से दस महिलाएँ हैं, जिनकी उम्र 19 से लेकर 50 वर्ष के बीच है। इनमें से कम से कम एक महिला गर्भवती है, और दो महिलाएँ अपने दूध पीते बच्चों को पीछे छोड़कर आई हैं।
स्थानीय कार्यकर्ताओं से पी.यू.डी.आर को मिली जानकारी के अनुसार, 11 मार्च की सुबह तड़के सैकड़ों पुलिसकर्मियों और निजी व्यक्तियों ने मिलकर ‘माँ माटी माली सुरक्षा मंच’ के एक नेता के घर को निशाना बनाया और ज़बरदस्ती घर में घुस गए। नेता के घर के अलावा, चाकू और लाठियों से लैस इस हमलावर दल ने गाँव के अन्य घरों में भी ज़बरन घुसकर दरवाज़े और दीवारें तोड़ दीं, और घर का सामान व खेती के औज़ार नष्ट कर दिए। निवासियों को घसीटकर घरों से बाहर निकालकर पीटा गया। इस हमले का विरोध करने वाले लोगों को भी बेतरतीब ढंग से पकड़कर गिरफ्तार किया गया। यह तांडव सुबह 7 बजे तक जारी रहा। पी.यू.डी.आर को पता चला है कि कई ग्रामीण डर के मारे जंगलों में भाग गए। इस कवायत में कई लोगों के घर का सामान, आधार कार्ड, वोटर कार्ड और राशन कार्ड जैसे ज़रूरी सरकारी दस्तावेज़ गुम गए।
12 मार्च को, थुआमुल रामपुर के JFMC सिविल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने 21 आदिवासियों को ज़मानत देने से इनकार कर दिया। इसका कारण उन पर लगाई गई धाराओं की गंभीरता बताया गया। पुलिस ने यह भी कहा था कि जाँच अभी ‘शुरुआती चरण’ में है। सभी 21 आरोपियों को भवानीपटना ज़िला जेल में न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। 6 अप्रैल को, सेशंस कोर्ट ने भी एक बार फिर उनकी ज़मानत की अर्ज़ी खारिज कर दी। जज द्वारा इस मामले की सुनवाई टाले जाने के पीछे केस डायरी का न मिलना बताया गया। इसके अलावा, पुलिस ने अभी तक घायलों की रिपोर्ट भी जमा नहीं की है। नतीजतन, पिछले लगभग चार हफ़्तों से, ये 21 आदिवासी बिना किसी राहत के जेल की सलाखों के पीछे ही हैं। उन पर ‘गैर-ज़मानती धाराएँ’ लगाए जाने की वजह से, सेशंस कोर्ट में ज़मानत की सुनवाई में होने वाले विलंब के चलते, इन ग्रामीणों को अनिश्चित काल तक जेल में रखना संभव हो गया है।
सभी 21 लोग आदिवासी किसान और मज़दूर हैं, जिनकी रोज़ी-रोटी ज़मीन पर ही निर्भर है। उनके परिवार—जिनमें बच्चे भी शामिल हैं—गहरे सदमे में हैं। वे बेसब्री से उनके वापस आने का इंतज़ार कर रहे हैं, ताकि उनके रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा रहे घर-गृहस्थी के काम और कमाई का सिलसिला फिर से शुरू हो सके।
25 मार्च को, कालाहांडी ज़िले के भवानीपटना में लिंगराज आज़ाद और सुरेश संग्राम को गिरफ़्तार कर लिया गया। समाजवादी जन परिषद के अध्यक्ष लिंगराज आज़ाद और सुरेश संग्राम, वेदांता के बॉक्साइट खनन प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ चल रहे संघर्ष में सबसे अग्रणी रहे हैं और ‘माँ माटी माली सुरक्षा मंच’ के सलाहकार भी हैं। उन पर BNS की धारा 115(2) (जानबूझकर चोट पहुँचाना), 109(1) (हत्या का प्रयास), 310(2) (डकैती), 351(3) (गंभीर आपराधिक धमकी), 191(2) (दंगा), 191(3) (घातक हथियार के साथ दंगा), और 190 (साझा इरादे से गैर-कानूनी जमावड़ा) के तहत मुक़दमा दर्ज किया गया है। 6 अप्रैल को काशीपुर सेशंस कोर्ट द्वारा दोनों की ज़मानत अर्ज़ी ख़ारिज कर दी गई और उन्हें रायगड़ा जेल भेज दिया गया।
मौजूदा कार्रवाई, हमलों के उस पुराने सिलसिले का ही तीव्र रूप है जिसे पी.यू.डी.आर ने पहले भी दर्ज किया है—चाहे वह अगस्त 2023 में काशीपुर और नियामगिरी में पुलिस की सख़्त कार्रवाई का मामला हो, या सितंबर 2024 में ‘माँ माटी माली सुरक्षा मंच’ के सदस्यों की अंधाधुंध गिरफ़्तारियों का मामला। नेताओं और कार्यकर्ताओं के अलावा, खदानों का विरोध करने वाले पूरे आदिवासी और दलित समुदायों को, निजी निगमों और सरकारी सत्ता की मिली-जुली ताक़त के ज़रिए परेशान और आतंकित किया जा रहा है। ये गिरफ़्तारियाँ, पाबंदी के आदेश, और रात के समय होने वाली छापेमारी व हमले—उस समुदाय के लिए बेहद विनाशकारी हैं जो अपनी रोज़ी-रोटी के लिए खेती-बाड़ी और जंगल से जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने पर निर्भर है। किसान और मज़दूर होने के नाते, पाबंदी का यह आदेश स्थानीय लोगों के काम-धंधे और रोज़मर्रा की ज़रूरतों पर सीधा हमला है। ज़मानत देने से किया गया इनकार न केवल एक ‘दब्बू’ न्यायपालिका के चरित्र को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस तरह किसी संघर्ष को ही ‘अपराध’ बना दिया जाता है—और इसके साथ ही लोगों के जीवन और आजीविका को भी पूरी तरह तबाह कर दिया जाता है।
पी.यू.डी.आर मांग करता है :
- तलामपदर के ग्रामीणों को तत्काल रिहा किया जाए।
- लिंगराज आज़ाद और सुरेश संग्राम को तत्काल रिहा किया जाए।
- अपराधीकरण और आतंक के ज़रिए ग्रामीणों पर होने वाले हमलों को तत्काल रोका जाए।
- खनन क्षेत्र की एप्रोच सड़क के निर्माण के संबंध में 3 अप्रैल को जारी निषेधाज्ञा को तत्काल वापस लिया जाए।
- अवैध छापों, हिंसा, तोड़फोड़ और मनमानी गिरफ्तारियों के लिए ज़िम्मेदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
दीपिका टंडन और शहाना भट्टाचार्य
सचिव, पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पी.यू.डी.आर)
