People’s Union for Democratic Rights

A civil liberties and democratic rights organisation based in Delhi, India

5 जनवरी 2026 को, सुप्रीम कोर्ट ने य़ूएपीए के तहत एफ.आई.आर. 59/2020 के तथाकथित ‘दिल्ली दंगों की साज़िश मामले’ में अपना पहला महत्वपूर्ण आदेश दिया, जिसमें पांच लोगों (गुलफिशा फातिमा, शिफा उर रहमान, मीरान हैदर, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद) को ज़मानत दी गई और दो लोगों (उमर खालिद और शरजील इमाम) की ज़मानत याचिका खारिज कर दी गई। FIR में नामजद अठारह लोगों में से, उमर खालिद और शरजील इमाम के अलावा, सिर्फ चार लोग हिरासत में हैं: खालिद सैफी और अथर खान (जिन्होंने 2 सितंबर के आदेश के खिलाफ अपील नहीं की), तस्लीम अहमद (जिन्हें दिल्ली हाईकोर्ट की एक अलग पीठ के 2 सितंबर के आदेश से जमानत नहीं मिली और अपील नहीं की गई) और सलीम मलिक (जिन्होंने मई 2024 में सुप्रीम कोर्ट से अपनी जमानत याचिका वापस ले ली थी)।

लगभग छह साल के बाद, इस बेल ऑर्डर से पांच लोगों की रिहाई उनके, उनके परिवारों और दोस्तों के लिए एक बड़ी राहत है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का आदेश चिंताजनक है, क्योंकि यह मनगढ़ंत आतंकवाद के आरोपों के आधार पर नागरिकता अधिकारों के आंदोलन पर लगातार हो रहे उत्पीड़न को बढ़ावा देता करता है।

दिल्ली पुलिस को छोड़कर, सभी के मुताबिक दिसंबर 2019 से मार्च 2020 तक की घटनाओं में नागरिकता संशोधन कानून को वापस लेने की मांग के लिए बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिक आंदोलन हुए। यह कानून साफ ​​तौर पर गैर-संवैधानिक है जो नागरिकता के अधिकार को धार्मिक पहचान से जोड़ता था। आखिरकार उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक दंगों के ज़रिए इस आंदोलन को खत्म कर दिया गया, जिसमें कम से कम 53 लोगों की मौत हुई, आगजनी हुई और धार्मिक अल्पसंख्यकों को उनके घरों और रोज़गार से विस्थापित होना पड़ा। कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर और रागिनी तिवारी, जिन्हें दिल्ली पुलिस के सीनियर अधिकारियों की मौजूदगी में नागरिकता अधिकारों के आंदोलन के खिलाफ़ ज़हरीले नफ़रती भाषण देते हुए रिकॉर्ड किया गया था, उन के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई शुरू करने के बजाय राज्य ने बड़े पैमाने पर हुई हिंसा के पीड़ितों को ही एक मनगढ़ंत ‘आतंकी साज़िश’ का दोषी ठहरा दिया है।

सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों – छात्रों, कार्यकर्ताओं और वॉलंटियर्स और जिनका विरोध प्रदर्शनों से कोई लेना-देना नहीं था – उन लोगों की गिरफ्तारी के बाद, लड़ाई अब अदालतों में पहुँच गई है, जहाँ य़ूएपीए और उसकी व्याख्या मुख्य मुद्दा बन गई है। 5 जनवरी का आदेश न केवल आरोपी के खिलाफ आरोपों की जाँच करके राज्य को जवाबदेह ठहराने में विफल रहता है, बल्कि यह वास्तव में, य़ूएपीए के तहत स्थापित न्यायशास्त्र के खिलाफ उमर खालिद और शरजील इमाम की लगातार कैद को सही ठहराने के लिए न्यायिक मिसाल कायम करता है।

पहली बात, सुप्रीम कोर्ट ने KA नजीब मामले में अपनी ही 3-जजों की बेंच के फैसले को कमज़ोर कर दिया, जिसमें संविधान के आर्टिकल 21 के आधार पर य़ूएपीए के तहत लंबे समय तक जेल में रहने के आधार पर ज़मानत देना ज़रूरी किया गया था। कोर्ट य़ूएपीए के एक स्पेशल कानून होने के आधार पर इस सिद्धांत से पीछे हट गया, यह नज़रअंदाज़ करते हुए कि नजीब का फैसला खुद UAPA के तहत ही दिया गया था और इसमें पहले से ही राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े एक स्पेशल कानून के तौर पर इसकी प्रकृति का ध्यान रखा गया था। इसके बजाय, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की कथित भूमिका को ‘मास्टरमाइंड’ और साज़िश के ‘आर्किटेक्ट’ के तौर पर पेश करने के लिए नए सिद्धांत बनाए, ताकि उनकी लंबी प्री-ट्रायल हिरासत में आर्टिकल 21 के उल्लंघन को नज़रअंदाज़ किया जा सके।

दूसरी बात, सुप्रीम कोर्ट ने वर्नोन गोंसाल्वेस मामले में अपने ही पिछले फैसले को कमजोर कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि य़ूएपीए के तहत जमानत देने से इनकार करने के लिए पहली नज़र में केस बनता है या नहीं, यह तय करते समय, कोर्ट को अभियोजन पक्ष के सबूतों की अहमियत या साफ तौर पर अस्वीकार्य करने का अधिकार है। 5 जनवरी 2026 के आदेश में, सुप्रीम कोर्ट कहता है: “जांच कानूनी संभावना की है, न कि सबूतों की पर्याप्तता की।”

तीसरा , अदालत ने कहा कि यूएपीए  की धारा 15 में आतंकवादी कार्रवाई की परिभाषा “हिंसा के पारंपरिक तरीकों” या “तत्काल शारीरिक हिंसा” तक सिर्फ सीमित नहीं है।  बल्कि य़ूएपीए की इस धारा की भाषा यह है कि “किसी भी अन्य तरीके से, चाहे वह किसी भी प्रकृति का हो” के आलोक में यह ज़्यादा व्यापक है। मुख्य अदालत ने इस परिभाषिक सवाल से जुड़े पहलू का ज़िक्र संक्षेप में क्यों किया? ज़मानत की अर्जी देने वालों का यह कहना था कि एक विरोध प्रदर्शन को आतंकवादी कार्रवाई माना जा रहा था। भाषण और विभिन्न मुद्दों पर विरोध के कार्यकमों को आतंकवाद नहीं माना जा सकता। आदेश के कुछ हिस्सों में आगे जांच और बहस की ज़रूरत होगी क्योंकि पहले से ही यह अस्पष्टता से भरा कानून है। कोर्ट ने मूल रूप से आरोपी के मौलिक सवाल से ही किनारा कर लिया है: क्या इस मामले में यूएपीए लागू होना चाहिए? अठारह आरोपियों को आतंकवाद के मामले में क्यों फंसाया जा रहा है ? जबकि उनमें से कुछ पहले से ही हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप वाले  मामलों का सामना कर रहे हैं। इन पर यूएपीए लगाना राजनीतिक और संदेहजनक  लगता है और यह जेल में बनाए रखने का एक तरीका लगता है। आदेश के कुछ अमूर्त हिस्सों में धारा के प्रावधानों की व्याख्या के सवाल से निपटने के बजाय, अदालत को मौजूदा न्यायशास्त्र को लागू करना चाहिए कि आतंकवाद कानूनों को लागू करने की गहन जांच होनी चाहिए।

चौथा, ज़मानत के लिए कड़ी शर्तें लगाई गई हैं। बेल पर रिहा किए गए आरोपी के अधिकारों के पूरी तरह उल्लंघन और कटौती के लिए तीन शर्तें रेखांकित की जा सकती हैं। कोर्ट ने ज़मानतदारों के लिए मुश्किल शर्तें रखी हैं, जिसमें हर एक के लिए 2,00,000 रुपये के दो स्थानीय ज़मानतदारों की मांग की गई है, जो मौजूदा कानूनी और न्यायिक आदेशों के खिलाफ है कि ज़मानत की रकम इतनी ज़्यादा नहीं होनी चाहिए। शर्त (vi) आरोपियों को इस मामले से “जुड़े” किसी भी समूह या संगठन से संपर्क से रोकती है, शर्त (viii) आरोपियों को किसी भी कार्यक्रम/बैठक/रैली/सभा में भाग लेने या शामिल होने से रोकती है और शर्त (ix) आरोपियों को कोई भी पोस्ट, पोस्टर आदि प्रसारित करने से रोकती है। असल में किसी भी सामाजिक या राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की बंदिशें आरोपियों पर लगाई गई है। अधिकार यह है कि दोषी नहीं माने जाने वालों को आजाद जीवन जीना चाहिए लेकिन ज़मानत की शर्तों के माध्यम से जांच एजेंसी द्वारा नामित समूहों/संगठनों (जिनमें से कोई भी प्रतिबंधित गैरकानूनी संगठन या आतंकवादी संगठन नहीं है) को अलग-थलग कर दिया गया है।

पीयूडीआर का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश पांच लोगों को ज़मानत से राहत देने के अलावा ऐसी व्यवस्था के राजनीतिक हितों को पूरा करता है जो मुक़दमे के बजाय उत्पीड़न को तरजीह देता है।

शाहाना भट्टाचार्य और दीपिका टंडन
(सचिव)
pudr@pudr.org

 

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